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शहरों की जहरीली हवा और बिगड़ती मानसिक सेहत, PM2.5 का सीधा असर

हालांकि केंद्र सरकार के बजट में मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत करने पर ज़ोर दिया गया है, लेकिन एक नई नेशनल स्टडी चिंता बढ़ा रही है। रिसर्च के मुताबिक, लंबे समय तक हवा में मौजूद PM2.5 के संपर्क में रहने से डिप्रेशन और एंग्जायटी का खतरा बढ़ जाता है।

अध्ययन का विवरण:
IIT दिल्ली के शोधकर्ताओं ने AIIMS नई दिल्ली, NIMHANS और सेंट जॉन्स मेडिकल कॉलेज के साथ मिलकर 12 राज्यों के 34,802 वयस्कों का डेटा एनालिसिस किया। अध्ययन को अंतरराष्ट्रीय जर्नल iScience में प्रकाशित किया गया।

मुख्य निष्कर्ष:

  • PM2.5 के लंबे समय तक संपर्क में रहने वालों में डिप्रेशन का खतरा 8% और एंग्जायटी का जोखिम 2% अधिक पाया गया।

  • असर सबसे ज्यादा शहरी क्षेत्रों, 40-49 साल के उम्र वर्ग और कम आय वाले लोगों में देखा गया।

  • क्षेत्रीय अंतर: पूर्वी भारत में डिप्रेशन अधिक, पश्चिमी भारत में एंग्जायटी अधिक।

हवा के तत्वों का प्रभाव:

  • सल्फेट, नाइट्रेट और अमोनियम (ट्रैफिक, उद्योग, कृषि से) → डिप्रेशन से संबंध।

  • एलिमेंटल कार्बन (डीजल और फॉसिल फ्यूल से) → एंग्जायटी से सबसे मजबूत संबंध।

विशेषज्ञ का कथन:
AIIMS के डॉ. आनंद कृष्णा का कहना है कि बड़े स्तर पर प्रदूषित हवा के संपर्क में रहने वाले लोगों में छोटे दिखने वाले संबंध भी गंभीर परिणाम दे सकते हैं।

निष्कर्ष:
स्टडी प्रदूषण घटकों की पहचान करके यह तय करने में मदद करती है कि किन स्रोतों पर प्राथमिकता से कार्रवाई हो। जब देश के कई हिस्सों में हवा की गुणवत्ता खराब होती जा रही है, ऐसे निष्कर्ष नीति निर्माण और स्वास्थ्य रणनीति के लिए महत्वपूर्ण हैं।

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है। इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें। नई गतिविधि या व्यायाम अपनाने से पहले विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।

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